सागर/मालथौन। युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल भक्ति और आस्था का विषय नहीं, बल्कि कर्म, धर्म, न्याय, नारी सम्मान, प्रकृति संरक्षण, नेतृत्व और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा देने वाला जीवन है। भगवान श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले गीता के माध्यम से मानव समाज को कर्म का महत्व समझाया और यह संदेश दिया कि धर्म के मार्ग पर चलते हुए अन्याय, अत्याचार, अधर्म और अहंकार के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। उनका पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्तव्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। जन्माष्टमी हमें केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का स्मरण कराने वाला पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन करने का अवसर भी है कि श्रीकृष्ण के विचारों, उनके कर्म और उनके जीवन मूल्यों के लिए हमारे अपने जीवन में कितना स्थान है।
अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मालथौन के श्री देव नारायण मंदिर, कारसदेव बाबा मंदिर परिसर में आयोजित श्रीकृष्ण जन्मोत्सव महोत्सव एवं विशाल शोभायात्रा में सहभागिता का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर बाल कृष्ण की माखन चोरी की लीला, बांसुरी बजाते श्याम, ग्वाल-बालों के साथ खेलते नंदलाल और यशोदा मैया को मोहित करते बाल गोपाल की छवियां हमारे मन में जीवंत हो उठती हैं, लेकिन यही बालक आगे चलकर कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को जीवन का गहन दर्शन देते हैं। उनकी बाल लीलाओं की सरलता और गीता के ज्ञान की गंभीरता मिलकर भगवान श्रीकृष्ण के पूर्ण स्वरूप को सामने रखती है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से कर्म को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। गीता का संदेश है कि संसार कर्म प्रधान है और मनुष्य के कर्म ही उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। व्यक्ति को अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए तथा कर्म करते समय परिणाम की चिंता से अधिक कर्म की शुद्धता और धर्म के मार्ग पर चलने को महत्व देना चाहिए। श्रीकृष्ण के जीवन से यह भी सीख मिलती है कि मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में अपना आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए। उनके सामने जीवन में अनेक संकट आए, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने विष भी पिया, संघर्ष भी किया और युद्ध भी किया, लेकिन हर परिस्थिति का सामना धैर्य और आत्मविश्वास के साथ किया। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का जीवन आज भी युवाओं को परिस्थितियों से घबराने के बजाय सही निर्णय लेने और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन में नेतृत्व की कला का भी अद्भुत उदाहरण मिलता है। वे केवल दूरदृष्टि से परिस्थितियों को समझने वाले नहीं थे, बल्कि आवश्यकता के अनुसार सही निर्णय लेने और दूसरों को सही दिशा दिखाने वाले नेतृत्वकर्ता थे। महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शस्त्र न उठाकर अर्जुन के सारथी बने और पूरे युद्ध के दौरान उन्हें सही निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं है। जो नेता दबाव डालकर नेतृत्व करते हैं, वे केवल लोगों के हाथ जीत सकते हैं, जो प्रेरित करते हैं वे लोगों के मस्तिष्क जीतते हैं, लेकिन जो लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, वे उनके दिल जीत लेते हैं। श्रीकृष्ण का नेतृत्व इसी प्रकार का था, जिसमें दूरदृष्टि, विवेक, प्रेरणा और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण सारथी के रूप में विराजमान थे। कर्ण के शक्तिशाली बाणों से अर्जुन का रथ पीछे खिसक जाता था, जबकि अर्जुन के बाणों से कर्ण का रथ भी प्रभावित होता था। युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहले रथ से उतरने के लिए कहा और उसके बाद स्वयं रथ से नीचे उतरे। उनके उतरते ही रथ में आग लग गई। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि रथ पर उनके और हनुमान जी की उपस्थिति के कारण इतने शक्तिशाली बाणों के प्रहार के बाद भी रथ सुरक्षित रहा। इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि सही मार्गदर्शन, विश्वास और ईश्वर की कृपा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य की रक्षा करने वाली शक्ति बन सकती है।
अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने समाज को यह भी संदेश दिया कि स्वार्थ के कारण मनुष्य बड़े से बड़े पाप और विनाशकारी निर्णय लेने से भी नहीं हिचकता। स्त्री, धन और जमीन जैसे स्वार्थों की पूर्ति के लिए जब व्यक्ति धर्म और न्याय को भूल जाता है तो संघर्ष और विनाश की स्थिति पैदा होती है। महाभारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कौरवों के पास विशाल सेना और अनेक महान योद्धा थे, लेकिन उनके बीच मतभेद और नेतृत्व संबंधी कमजोरियों ने उनकी सामूहिक शक्ति को प्रभावित किया। इसके विपरीत पांडवों ने स्पष्ट उद्देश्य और एकजुटता के साथ संघर्ष किया। श्रीकृष्ण का संदेश है कि जहां मतभेद बढ़ते हैं, वहां सफलता कमजोर पड़ती है और जहां एकता, विश्वास तथा स्पष्ट उद्देश्य होता है, वहां बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में अन्याय और अधर्म के विरोध का संदेश भी स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने अत्याचार को कभी स्वीकार नहीं किया और धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष किया। दुर्योधन के प्रसंग में भी श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्ति अपने कर्मों से ही अपना भाग्य बनाता है। दुर्योधन के सामने जब भगवान श्रीकृष्ण और उनकी नारायणी सेना में से किसी एक को चुनने का अवसर आया तो उसने नारायणी सेना को चुना, जबकि पांडवों की ओर से स्वयं श्रीकृष्ण को स्वीकार किया गया। यह प्रसंग बताता है कि भौतिक शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण सही नेतृत्व, विवेक और धर्म का साथ है। व्यक्ति यदि गलत विकल्प चुनता है और अपने अहंकार में सही मार्गदर्शन को ठुकराता है तो उसकी शक्ति भी उसे सफलता नहीं दिला सकती।
अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने नारी सम्मान के माध्यम से भी समाज को महत्वपूर्ण संदेश दिया। द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा कर यह स्पष्ट किया कि किसी महिला का अपमान केवल उस महिला का नहीं, बल्कि पूरे समाज की गरिमा का अपमान है। द्रौपदी उस समय महिलाओं के सम्मान और न्याय की प्रतीक बनीं। श्रीकृष्ण का संदेश था कि शांति तभी सार्थक है, जब उसके भीतर न्याय, सम्मान, गरिमा और धर्म सुरक्षित हों। उन्होंने कहा कि आज जब हम नारी सम्मान और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से यह संदेश हजारों वर्ष पुराना दिखाई देता है कि समाज में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आचरण से यह भी सिखाया कि अधर्म और अन्याय से प्राप्त वैभव का कोई मूल्य नहीं होता। जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को अपने राजमहल में भोजन के लिए आमंत्रित किया तो श्रीकृष्ण ने उसका निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और विदुर के यहां भोजन किया। इसका मूल संदेश यह है कि भोजन और वैभव से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति के मन की भावना और उसके आचरण की पवित्रता है। यदि मन में प्रेम और सद्भाव नहीं है तो भव्यता भी संबंधों को सार्थक नहीं बना सकती। अधर्म के धन और स्वार्थ से प्राप्त सुख व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर उसे गलत दिशा में ले जा सकता है। इसलिए जीवन में साधन से अधिक साधना, वैभव से अधिक विचार और स्वार्थ से अधिक धर्म को महत्व देना चाहिए।
अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन में माता-पिता की जिम्मेदारी का भी महत्वपूर्ण संदेश मिलता है। गांधारी के प्रसंग से यह सीख मिलती है कि यदि माता-पिता को यह पता हो कि उनके बच्चे गलत रास्ते पर जा रहे हैं और वे उन्हें रोकने के बजाय मौन बने रहें, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। पुत्र मोह के कारण गलत को सही मान लेना परिवार और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक है। बच्चों को सही और गलत का अंतर समझाना तथा गलत रास्ते पर जाने से रोकना माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन और महाभारत के प्रसंग आज के परिवारों और युवाओं के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि व्यक्ति की गलतियों का परिणाम केवल उसके स्वयं के जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी हजारों वर्ष पहले दिया था। कालियानाग के कारण यमुना का जल विषैला हो गया था और लोगों के लिए उसका उपयोग कठिन हो गया था। श्रीकृष्ण ने कालियानाग का दमन कर जल और पर्यावरण की रक्षा का संदेश दिया। इसी प्रकार गोवर्धन पूजा के प्रसंग में उन्होंने गोकुलवासियों को प्रकृति, पर्वत, पशुधन और पर्यावरण के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है और उसके प्रति सम्मान तथा संरक्षण की भावना आवश्यक है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर विचार कर रही है, तब श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े ये प्रसंग हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का स्मरण कराते हैं।
उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण के नाम का स्मरण और उनके जीवन के संदेशों को समझना व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है। हाल ही में सुरंग में कई दिनों तक फंसे एक व्यक्ति के सुरक्षित बाहर निकलने और उसके द्वारा संकट के दौरान भगवान कृष्ण का जाप करने की बात का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में आस्था और आत्मविश्वास मनुष्य को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के नाम का स्मरण व्यक्ति को भय और निराशा से बाहर निकालकर कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की शक्ति देता है। इसी भाव से कृष्ण भक्ति में महामंत्रों और नाम जाप को विशेष महत्व दिया गया है तथा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय के जाप को भी श्रद्धालु पुण्यकारी मानते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का सार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। श्रीकृष्ण गीता के माध्यम से हमें कर्म और उसके फल का सिद्धांत समझाते हैं तथा भक्ति के माध्यम से यह विश्वास देते हैं कि जो मनुष्य प्रेमपूर्वक भगवान की शरण लेता है, उसके भीतर कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति विकसित होती है। इसलिए कृष्ण को केवल मंदिर में नहीं, बल्कि अपने विचारों, कर्मों, संबंधों और हृदय में स्थान देना चाहिए। यही गीता की सीख है, यही भक्ति की सार्थकता है और यही जन्माष्टमी के पर्व का वास्तविक संदेश है। दूसरों के लिए सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करने से समाज में सकारात्मक वातावरण बनता है और व्यक्ति का अपना जीवन भी बेहतर दिशा में आगे बढ़ता है।
अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम और संघर्ष के अद्भुत संतुलन का संदेश देता है। उन्होंने एक ओर प्रेम, करुणा, मित्रता और मानवता का मार्ग दिखाया तो दूसरी ओर अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का साहस भी दिखाया। उनके एक हाथ में बांसुरी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र का स्वरूप इसी संतुलन का प्रतीक माना जा सकता है कि शांति और प्रेम हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन धर्म, न्याय और राष्ट्र तथा समाज की रक्षा के लिए अन्याय के सामने दृढ़ता से खड़ा होना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी के इस पावन पर्व पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि अपने जीवन में धर्म, सत्य, कर्म, न्याय, प्रेम, नारी सम्मान, प्रकृति संरक्षण और सकारात्मक सोच को स्थान देंगे। यही भगवान श्रीकृष्ण के प्रति सच्ची श्रद्धा और उनके संदेश को जीवन में उतारने का सबसे सार्थक मार्ग है।
कार्यक्रम में लक्ष्मीनारायण यादव पूर्व सांसद, गौरी यादव, जयंत सिंह बुंदेला नपा अध्यक्ष, श्वेता यादव, नीतेश यादव मंडल अध्यक्ष, कप्तान यादव किसान मोर्चा महामंत्री, दुरग सिंह परिहार, शिवशंकर यादव, राजेंद्र यादव, संतोष यादव, वीरसिंह यादव, रावराजा राजपूत, दुलारे उस्ताद, पूजाराम यादव, आशीष पटेरिया, योगेश जैन, गोलू राय, राघवेंद्र परिहार, सरनाम तोमर, रामकुमार बघेल, कोमल यादव सहित अन्य उपस्थित रहे।

एक टिप्पणी भेजें