सागर/मालथौन। युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि शिक्षक समाज और राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव हैं। एक शिक्षक केवल विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाते हुए जीवन की सही दिशा, संस्कार और जिम्मेदारी का बोध कराता है। शिक्षक का मार्गदर्शन विद्यार्थी के पूरे जीवन को प्रभावित करता है और उनके द्वारा दिए गए ज्ञान एवं संस्कार लंबे समय तक समाज पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह सही आचरण, मजबूत चरित्र और अच्छे कर्मों में दिखाई दे। डिजिटल युग में विद्यार्थियों के सामने सूचनाओं की भरमार है, ऐसे में शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वे विद्यार्थियों को सही ज्ञान, सही दिशा और सही मूल्यों की पहचान कराने के साथ उनके भीतर स्वतंत्र चिंतन, जिज्ञासा और सीखने की प्रवृत्ति विकसित करते हैं।
अविराज सिंह ने मालथौन के एक्सीलेंस स्कूल में शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में सहभागिता करते हुए शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों के योगदान का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि उन गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन है, जो विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ जीवन जीने की सही दिशा और संस्कार प्रदान करते हैं। विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने और एक शिक्षित, संस्कारित एवं जिम्मेदार समाज के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर 31 स्कूलों के प्राचार्यों एवं प्रभारियों को शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।
उन्होंने कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारने का कार्य करते हैं। उनकी सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब उनके विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़कर समाज और देश के लिए योगदान देते हैं। आज आवश्यकता ऐसे शिक्षकों की है, जो विद्यार्थियों में परीक्षा की सफलता के साथ-साथ सत्य, अनुशासन, संवेदनशीलता, जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन और जिम्मेदारी जैसे जीवन-मूल्यों का विकास करें। जब विद्यार्थी अपने शिक्षक के मार्गदर्शन से एक अच्छा इंसान बनता है, तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है।
अविराज सिंह ने कहा कि शिक्षक दिवस महान शिक्षाविद एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है। उनका मानना था कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, स्वतंत्र सोच और संवेदनशील व्यक्तित्व के विकास का आधार है। शिक्षा मनुष्य को स्वतंत्र चिंतन और सत्य की खोज के लिए प्रेरित करे, यही शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने, नई चीजें सीखने और निरंतर ज्ञान अर्जित करने की प्रवृत्ति विकसित करना आवश्यक है। जब हम यह मानने लगते हैं कि हम सब कुछ जानते हैं, तभी हमारा सीखना रुक जाता है। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को जीवनभर सीखने की भावना बनाए रखते हुए अपने ज्ञान को मजबूत चरित्र और अच्छे कर्मों में परिवर्तित करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। भगवान श्रीराम के गुरु वशिष्ठ, पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और चंद्रगुप्त मौर्य के मार्गदर्शक आचार्य चाणक्य जैसे उदाहरण इस परंपरा की महत्ता को दर्शाते हैं। एक अच्छे शिक्षक का प्रभाव कक्षा की चार दीवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके विचार, संस्कार और मार्गदर्शन विद्यार्थी के पूरे व्यक्तित्व तथा भविष्य को प्रभावित करते हैं। शिक्षक केवल विषय का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन के सही और गलत रास्ते के बीच अंतर समझाने का कार्य भी करते हैं। उन्होंने कहा कि जब विद्यार्थी अपने शिक्षक के मार्गदर्शन से अच्छा इंसान बनकर समाज और देश के लिए योगदान देता है, तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सार्थक होता है।
कार्यक्रम में जयंत सिंह बुंदेला नप. अध्यक्ष, अरविंद सिंह लोधी मंडल अध्यक्ष, रामकुमार बघेल, रावराजा राजपूत, पुष्पेंद्र परिहार जिला उपाध्यक्ष, देवेंद्र बुंदेला, आशीष पटेरिया, हाकम राजपूत, धर्मेंद्र राय, जितेंद्र कुशवाहा, ध्रुव कुशवाहा प्राचार्य, हम्मीर सिंह, रामबाबू तिवारी, शंकर दयाल सोनी, गोलू राय, जगभान अहिरवार, धर्मेंद्र अहिरवार, नरेश तिवारी, पवन उपाध्याय, हरिराम अहिरवार, राजेंद्र तिवारी, बीएम लोधी, रविंद्र यादव, राघवेंद्र यादव, कुलदीप परमार, ऋषि राजा बुंदेला, चरण सिंह लोधी, इंदु कुशवाहा, शिवराज राजपूत, दुर्गा प्रजापति, मुंशी रजक, माधव परिहार, सरनाम सिंह, जाहर सिंह, प्रदीप मालवीय, गगनदीप सिंह राजपूत एवं बलराम ठाकुर उपस्थित रहे।
मटकी फोड़ प्रतियोगिता में लिया हिस्सा
अविराज सिंह ने कहा कि मालथौन के किला प्रांगण में आयोजित मटकी फोड़ प्रतियोगिता में भी सहभागिता का अवसर मिला। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आयोजित ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारी परंपराओं को जीवंत रखने के साथ समाज में उत्साह, सहभागिता और आपसी जुड़ाव का वातावरण बनाते हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें आनंद के साथ-साथ कर्तव्य, साहस, विवेक और मानवता का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति और परंपराओं से नई पीढ़ी को जोड़ना आवश्यक है, ताकि युवा आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ अपनी जड़ों, संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्यों से भी जुड़े रहें। सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में लोगों की सहभागिता आपसी सौहार्द और भाईचारे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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